क्योंकिं साहिब, गलत थी मैं।

अरे मैं भी कहाँ, मेरा तो जनम ही गलत था।

कुछ भी कह लो आप, लोग हज़ारो वजहें बता देंगे मेरे गलत होने की,

उनके पास वाजिब सबूत भी तो है, मेरे गलत होने के;

मांगो उनसे, देंगे वो सबूत, थे उनके पास नए जमाने के हथियार,

लाइव गयी है मेरी बेशर्मी की तस्वीरें, मांगो तो सही, मिलेगा ज़रूर।

सुनो साहिब, छोटे थे मेरे कपड़े, गलती मेरी हैं,

ज़रा सस्ती थी वो झीनी चुनरिया, वही खरीद बैठी- महँगी खादी की जगह;

दुकानदार देख रहा था मेरी गलती तो मेरी तरफ झांक झांक कर, 

गलती मेरी ही थी, पता ही न चला।

सुनो साहिब, गलती मेरी थी,

एक तो माँ बाप से पढ़ाई करूँगी की जिद्द कर बैठी, और ऊपर से दोस्ती कर बैठी,

दोस्ती भी किनसे, ना लाज है मुझमे और ना ही रत्ती भर दिमाग,

कुछ थे लड़के, मेरे दोस्त, सब अच्छे ही तो थे, कभी किसी ने मेरी तरफ उस दुकानदार की नज़रों से नही देखा; गलत थे वो,

गलती तो उनकी भी थी, क्योंकि मेरी गलती कभी बताई ही नहीं उन्होंने।

सुनो साहिब, एक और गलती मेरी

मेरी ज़बान की गलती, कमबख्त हमेशा चलती रहती थी,

जवाब देती थी उनको जो समाज मे सही थे, जो हमेशा सही रहेंगे, भगवान बन गया है उनका सही रहना,

मिला मुझे सबक मेरी गलती का;

पर आपको अब भी नहीं पता कि क्या थी मेरी गलती?

अब कबूल कर लेना बेहतर होगा।

गलती थी मेरी की मेरे कपड़ो से झांक रही थी मेरी गर्दन, चेहरा, हथेलियां और पाँव,

थे कपड़े भारतीय, पर थे तो कम ना और मुँहफट भी तो हो चली थी मैं।

एक बात सुनो और समझो साहिब, समाज की रीति और विचार कभी गलत नहीं होते, मैं गलत थी, 

क्या आपको नहीं मालूम की लड़का लड़की दोस्त नही होते,

बहुत कोशिश की, पर कहाँ छुपा पायी अपनी ये ओछी हरकतें?

दिनभर घूमा करती थी उन्हीं दोस्तो के साथ, लोग सही समझते थे, बेगैरत और गलत तो मैं थी साहिब।

पर रोये बहुत थे, वही दोस्त, मेरे जनाज़े पर।

वो नादान थे, मेरे जनाज़े पर इरादा किया था कि इंसाफ मिलेगा मुझे;

बताया ना मैंने आपको नासमझ थे वो, मुझे इंसाफ मिलता तब न, जब मैं सही होती।

देखो साहिब, मेरी बेशर्मी पर पड़ी झीनी चादर उतारीथी भरे बाजार में, किसी ने गलत नही किया, रोका नहीं उतारने वालो को,

समाज हमेशा सही होता हैं।

मैं सबक बनूँगी।

माँग लेना मेरी बेशर्मी के सबूत, दिखा देना मेरी जैसी बेवकूफ लड़कियों को, चाहे तो इशारा भी कर देना मेरी ओर,

क्योंकि आखिर गलती तो मेरी ही थी।

Advertisements